राजस्थान में सिरेमिक शिक्षा सेतु अभियान के तहत गरीब और मेधावी छात्रों को मुफ्त में सरकारी नौकरी की तैयारी करवाई जाएगी, जिससे हजारों युवाओं को बड़ा अवसर मिलेगा.
कैंपेन का चेहरा कौन?
इस पूरे कैंपेन के पीछे आरएएस भर्ती परीक्षा की तैयारी करवाने वाले शिक्षक विकास गुप्ता का विचार छिपा है. वे कहते हैं, “मैं जब भी किसी सरकारी स्कूल में जाता हूं, हमेशा यही विचार मन में आता है कि एक तरफ दुनिया एआई अवतार से पढ़ाने की बात कर रही है, स्मार्ट एजुकेशन की बात कर रही है, और एक तरफ ये बच्चे हैं, जिनके लिए सामान्य ब्लैकबोर्ड तक उपलब्ध नहीं. ऐसे में ये बच्चे बाकी दुनिया के साथ कैसे प्रतिस्पर्धा कर पाएंगे?”
गुप्ता आगे कहते हैं, इंफ्रास्ट्रक्चर का यह अभाव बच्चों के मनोबल को तोड़ता है. और समस्या सिर्फ इस अभाव की नहीं है. समस्या हमारी अप्रोच की है. हमें इन बच्चों की अहमियत ही नहीं पता. इन बच्चों को ज़रूरत है तो सिर्फ मौके की. और यह मौका देने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं, बल्कि समाज की भी है. इसी बात को ध्यान में रखते हुए हमने “सिरेमिक शिक्षा सेतु” अभियान शुरू किया.
कैसे चुना नाम?
इस अभियान के नाम के पीछे छिपे संदेश को लेकर विकास गुप्ता बताते हैं. वे कहते हैं, अंग्रेजी भाषा के Ceramic शब्द का अर्थ होता है, कच्ची मिट्टी को पकाकर उसे आकार देना. बच्चे भी कच्ची मिट्टी जैसे ही होते हैं. यदि उन्हें सही समय पर रास्ता दिखाया जाए तो वे सही आकार में ढल जाते हैं.
गुप्ता कहते हैं, हमारा लक्ष्य है कि इस अभियान से जुड़ने वाला हर बच्चा राजस्थान की सबसे बड़ी परीक्षा RAS में उत्तीर्ण होकर अधिकारी बने. लेकिन कोई बच्चा यदि दूसरी नौकरियों जैसे, ईओ-आरओ, सब-इंस्पेक्टर या स्कूल व्याख्याता जैसी भर्तियों की तैयारी करना चाहे, तो हम उसे ये कोर्स भी उपलब्ध करवाएंगे.
बच्चों की संख्या से जुड़े सवाल पर वे कहते हैं, “हम पिछले कुछ वर्षों से लगातार अपनी क्षमता के अनुसार ऐसे मेधावी बच्चों की किसी न किसी रूप में मदद करने की कोशिश कर रहे थे, जो अभाव से ग्रस्त हों, ताकि उनकी तैयारी में रुकावट न आए. पिछले साल यह संख्या 100 के आसपास थी. लेकिन इस बार हमने यह अभियान शुरू करने के साथ तय किया है कि हम प्रदेश के 1000 बच्चों को पूरी तरह नि:शुल्क तैयारी करवाएंगे. इसमें कंटेंट और गाइडेंस भी शामिल हैं.”
क्या है टारगेट?
“हमारा लक्ष्य है कि राजस्थान के हर जिले से औसतन 20 बच्चे इस अभियान से जुड़ सकें. यह सिर्फ अंक नहीं है, बल्कि एक बड़े बदलाव की शुरुआत है.” विकास गुप्ता आगे जोड़ते हैं, बच्चों की सहूलियत के लिए हमने इस कोर्स का माध्यम ऑनलाइन तय किया है, ताकि वे अपने गांव-कस्बे में रहकर ही पढ़ाई कर सकें और उन पर किसी तरह का अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़े.
12वीं कक्षा में 99.6% अंक हासिल कर आर्ट्स विषय में राजस्थान टॉप करने वाली नव्या मीणा इस अभियान से जुड़ने वाली पहली स्टूडेंट हैं. जयपुर के पास एक गांव में रहने वाली नव्या कहती हैं कि उनके पिता गुजरात में टाइल फैक्ट्री में काम करते हैं. घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए आरएएस की तैयारी मुश्किल थी, लेकिन विकास सर की इस पहल से जुड़ने के बाद परिवार की उम्मीद जगी है कि वह भी अधिकारी बन सकती है.
भरतपुर की राजकुमारी शर्मा इस मुहिम से जुड़ने वाली एक और छात्रा हैं. राजकुमारी ने इस साल 12वीं में 99% अंक हासिल किए हैं. वह कहती हैं, मन तो आरएएस अधिकारी बनने का ही था, लेकिन फीस न होने की वजह से टीचर बनने की तैयारी शुरू करने वाली थी. लेकिन अब मुझे अपना सपना अधूरा नहीं छोड़ना पड़ेगा.
विकास गुप्ता ज़ोर देकर कहते हैं कि तमाम प्रयास के बाद वे किसी एक भी बच्चे की ज़िंदगी बदल पाए, तो उनकी यह पूरी कवायद सार्थक हो जाएगी.
हालांकि अपनी तरह की यह इकलौती मुहिम नहीं है, जिसे विकास गुप्ता ने सरकारी स्कूलों में बदलाव लाने के लिए शुरू किया है. उन्होंने हर महीने, एक शौचालय नाम से भी एक अन्य अभियान शुरू किया है.
वे कहते हैं, कई सरकारी स्कूलों में शिक्षिकाओं और बच्चियों को वॉशरूम न होने की स्थिति में घंटों तक टॉयलेट रोककर रहना पड़ता है. रिपोर्ट्स बताती हैं कि इससे यूरिन इंफेक्शन से लेकर पथरी तक की बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है. इसलिए हमने प्रण लिया है कि हर महीने किसी भी एक सरकारी स्कूल में टॉयलेट का निर्माण करवाएंगे. गुप्ता ने इस पहल की शुरुआत अपने गृह जिले श्रीगंगानगर से पिछले महीने की है.
